तुम्हारे बिन...

तुम्हारा उम्र में बड़े होने का क्या फायदा, सब कुछ तो आधा-आधुरा समझती हो तुम!
अल्फाज तो झट से समझ लेती हो मेरे, मगर जज्बात क्यों नहीं समझती तुम!
और मेरे ना होने के बाद अहसास होगा तुम्हें, जब खुद को तन्हा देखोगी तुम!
कहा मानो छोड़ दो ये बेकार की जिद और मान जाओ, सच तो ये है मेरा कोई नहीं तुम्हारे बिन !

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कबीर हिंदी साहित्य के महिमामण्डित व्यक्तित्व

बारिश की रात