चांद की मौत
अधूरी ख्वाहिशों की आग में
जलता चांद
ग़म इतना गहरा
कि हर रोज थोड़ा-थोड़ा गलता है
कट-कट कर गिरते हैं
उसके शरीर के अंग
इतनी अंधेरगर्दी बर्दाश्त नहीं कर पाता
और आखिरकार तोड़ देता है वो दम
कितनी छोटी सी ख्वाहिश थी उसकी
वह दुनियाभर के उन बच्चों के लिए
सचमुच रोटी बन जाना चाहता था
जो उस वक्त उसे रोटी समझ बैठे थे
जब वो भूख से बिलबिला रहे थे
वो गरम गरम गोल रोटी समझ चांद को तरसते रहे
और चांद रोटी बन उनकी भूख मिटाने को
दोनों की हसरतें रह गईं अधूरी
चांद मर गया
और बच्चों का क्या!
भूख से बच्चों का मर जाना
अब कोई खबर नहीं
दुनिया इसकी आदी हो चुकी है।
जलता चांद
ग़म इतना गहरा
कि हर रोज थोड़ा-थोड़ा गलता है
कट-कट कर गिरते हैं
उसके शरीर के अंग
इतनी अंधेरगर्दी बर्दाश्त नहीं कर पाता
और आखिरकार तोड़ देता है वो दम
कितनी छोटी सी ख्वाहिश थी उसकी
वह दुनियाभर के उन बच्चों के लिए
सचमुच रोटी बन जाना चाहता था
जो उस वक्त उसे रोटी समझ बैठे थे
जब वो भूख से बिलबिला रहे थे
वो गरम गरम गोल रोटी समझ चांद को तरसते रहे
और चांद रोटी बन उनकी भूख मिटाने को
दोनों की हसरतें रह गईं अधूरी
चांद मर गया
और बच्चों का क्या!
भूख से बच्चों का मर जाना
अब कोई खबर नहीं
दुनिया इसकी आदी हो चुकी है।

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