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Shree Sailya Shikhar Malikarjun

  Sikhar Malikarjun municipality has been named after the deity Malikarjun. Built in a very attractive style, the temple has a Gajur (wall) about 10 meters long. Attractive entrances have been constructed in the Awas Bhawan for the devotees and the temple decorated with flags all around. Devotees from Nepal and India have flocked to Malikarjun, a heritage site of faith, to engage in various spiritual activities and for self-peace. In order to worship Malikarjun Jatra, one has to eat only vegetarian food 15 days in advance, take a bath a week before, take a bath and stay in a brat. In the procession with the participation of thousands of people, worship is done by bringing hundreds of bazaars including Damaha. Bishal Gauraparva, considered to be the major festival of Province No. 7, is celebrated in Majikarjun. Thousands of people from different districts of the far west, including Uttarakhand in India, have come to the temple to see Gaura. In the Bhandari Ghar, the abode of Jalakar...

सुन्दर सुदूरपश्चिम

Who was Capt. Balbhadra Kunwar?

As commander of the Gorkhali forces in Dheradun, Capt. Balbhadra Kunwar was handed the responsibility of defending the area. The expanding Nepali/Gorkhali State had since the mid-late 18th century expanded the nation’s border on all sides, which eventually led to conflict with the British East India Company and a war followed. Realizing he could not defend the town of Dehradun, Capt. Balbhadra Kunwar withdrew to the strategic hill fort of Khalanga with an army strength of 600 including women and children against the British East India Company British stronghold of 3000-3500 troops. He turned down an incentive proposal of the British who would make him Governor of the WesternGarhwal should he surrender or leave Nepal. In the month of October 1814, Major General Sir Rollo Gillespie of the British army had advanced along with 3,500 troops and eleven pieces of cannon to occupy the Nepali territories situated between the Ganga and Yamuna rivers in the Gharwal and Kumaon regions that had...

कबीर हिंदी साहित्य के महिमामण्डित व्यक्तित्व

कबीर के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे, जिसको भूल से रामानंद जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। कबीर के माता- पिता के विषय में एक राय निश्चित नहीं है कि कबीर "नीमा' और "नीरु' की वास्तविक संतान थे या नीमा और नीरु ने केवल इनका पालन- पोषण ही किया था। कहा जाता है कि नीरु जुलाहे को यह बच्चा लहरतारा ताल पर पड़ा पाया, जिसे वह अपने घर ले आया और उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। कबीर ने स्वयं को जुलाहे के रुप में प्रस्तुत किया है - "जाति जुलाहा नाम कबीरा बनि बनि फिरो उदासी।' कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुई। ऐसा भी कहा जाता है कि कबीर जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से उन्हें हिंदू धर्म का ज्ञान हुआ। एक दिन कबीर पञ्चगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर प...

हर कोई मुझे जिंदगी जीने का तरीका बताता है.....

मौजूद थी उदासी अभी पिछली रात की, बहला था दिल जरा कि फिर रात हो गयी।  बताओ है कि नहीं मेरे ख्वाब झूठे, कि जब भी देखा तुझे अपने साथ देखा। आज ये पल है, कल बस यादें होंगी, जब ये पल ना होंगे, तब सिर्फ बातें होंगी, जब पलटोगे जिंदगी के पन्नों को, तो कुछ पन्नों पर आँखें नम और कुछ पर मुस्कुराहटें होंगी। काश तू इतनी सी मोहब्बत निभा दे, जब भी मैं रूठूँ तो तू मुझे मना ले।  होठों ने सब बातें छुपा कर रखीं …… आँखों को ये हुनर… कभी आया ही नहीं ……  हालात ने तोड़ दिया हमें कच्चे धागे की तरह… वरना हमारे वादे भी कभी ज़ंजीर हुआ करते थे..  हालात की दलील देकर उन्होनें साथ छोङ़ा , तो हम आहत नहीं हुए …., सोचा हमसे ना सही , चलो किसी से तो वफ़ा निभाई उन्होने…  हर मुलाक़ात पर वक़्त का तकाज़ा हुआ ; हर याद पे दिल का दर्द ताज़ा हुआ .!  हमें भुलाकर सोना तो तेरी आदत ही बन गई है,  सनम; किसी दिन हम सो गए तो तुझे नींद से नफ़रत हो जायेगी।  हर कोई मुझे जिंदगी जीने का तरीका बताता है। उन्हे कैसे समझाऊ की एक ख्...

शुक्रग़ुजार आँखें

पिछले मंगलवार , 26 जुलाई सन् 48 से पहले मेरे सीने में तपते हुए सात-सात छाले थे और सातों ने मिलकर दिल को फोड़ा बना दिया था। मां-बाप के कत्ल के छाले , भाई-बहन के कत्ल के छाले , युवा बेटे के कत्ल का छाला , बहादुर बेटी के कत्ल का छाला और जन्मसाथी घर की लक्ष्मी के कत्ल का छाला। अल्ला हो अकबर के नारों , पवित्र दाढ़ियों और पेशानी पर नमाज के चिन्हों ने इन शरीरों के भीतर से किस बेदर्दी से जान निकाली है। मां और धर्मपत्नी के साथ कैसी-कैसी शर्मनाक हरकतें। फूल-सी बच्ची का उसकी मां के सामने हलवा बनाया जाना — ओफ ! मैं स्वयं कैसे बच गया और कैसे उस शरणार्थी कैम्प तक आया , ये भी एक कष्टदायक कहानी है। और पिछली कहानियों का वर्णन करना मेरे बस में नहीं था। अब साहस तो है पर सामर्थ्य नहीं। क् योंकि जितने श ब् द दर्द को दिखाने के लिए मेरे पास हैं , दिल उन सबको निकम्मा घोषित कर चुका है।     पिछला मंगलवार अर्थात मेरे नवजीवन स...

अखबारवाला

कॉलिज के दिनों में एक बुरी लत गई, जो आज तक पीछा नही छोङ रही है। कई बार पत्नी से भी बहस हो जाती है, मेरे से ज्यादा प्यारा अखबार है, जिसके साथ जब देखो, चिपके रहतो हो। क्या किया जाए, अखबार पढने का नशा ही कुछ ऐसा है कि सुबह नही मिले तो लगता है कि दिन ही नही निकला। खैर पत्नि की अखबार वाली बात को गंभीरता से नही लेता हूं क्योंकि मेरे ऑफिस जाने के बाद खुद उसने पूरा अखबार चाटना है। पढी लिखी पत्नी चाहे, वो हाऊस वाईफ हो, एक फायदा तो होता है, कम से कम वह अखबार का महत्व समझती है। प्रेम भरी तकरार पति, पत्नी के प्यार को अधिक गाढा करती है। प्रेम भरी तकरार ही गृहस्थ के सूने पन को दूर करती है। तकरार ही आलौकिक प्रेम की जननी है। पहले ऑफिस घर के समीप था। सुबह अखबार तसल्ली से पढ कर ऑफिस जाता था, लेकिन नई नौकरी और ऑफिस घर से थोडा दूर हो गया तो घर से जल्दी निकलना पङता है। ढंग से अखबार ...