संदेश

जनवरी, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हर कोई मुझे जिंदगी जीने का तरीका बताता है.....

मौजूद थी उदासी अभी पिछली रात की, बहला था दिल जरा कि फिर रात हो गयी।  बताओ है कि नहीं मेरे ख्वाब झूठे, कि जब भी देखा तुझे अपने साथ देखा। आज ये पल है, कल बस यादें होंगी, जब ये पल ना होंगे, तब सिर्फ बातें होंगी, जब पलटोगे जिंदगी के पन्नों को, तो कुछ पन्नों पर आँखें नम और कुछ पर मुस्कुराहटें होंगी। काश तू इतनी सी मोहब्बत निभा दे, जब भी मैं रूठूँ तो तू मुझे मना ले।  होठों ने सब बातें छुपा कर रखीं …… आँखों को ये हुनर… कभी आया ही नहीं ……  हालात ने तोड़ दिया हमें कच्चे धागे की तरह… वरना हमारे वादे भी कभी ज़ंजीर हुआ करते थे..  हालात की दलील देकर उन्होनें साथ छोङ़ा , तो हम आहत नहीं हुए …., सोचा हमसे ना सही , चलो किसी से तो वफ़ा निभाई उन्होने…  हर मुलाक़ात पर वक़्त का तकाज़ा हुआ ; हर याद पे दिल का दर्द ताज़ा हुआ .!  हमें भुलाकर सोना तो तेरी आदत ही बन गई है,  सनम; किसी दिन हम सो गए तो तुझे नींद से नफ़रत हो जायेगी।  हर कोई मुझे जिंदगी जीने का तरीका बताता है। उन्हे कैसे समझाऊ की एक ख्...

शुक्रग़ुजार आँखें

पिछले मंगलवार , 26 जुलाई सन् 48 से पहले मेरे सीने में तपते हुए सात-सात छाले थे और सातों ने मिलकर दिल को फोड़ा बना दिया था। मां-बाप के कत्ल के छाले , भाई-बहन के कत्ल के छाले , युवा बेटे के कत्ल का छाला , बहादुर बेटी के कत्ल का छाला और जन्मसाथी घर की लक्ष्मी के कत्ल का छाला। अल्ला हो अकबर के नारों , पवित्र दाढ़ियों और पेशानी पर नमाज के चिन्हों ने इन शरीरों के भीतर से किस बेदर्दी से जान निकाली है। मां और धर्मपत्नी के साथ कैसी-कैसी शर्मनाक हरकतें। फूल-सी बच्ची का उसकी मां के सामने हलवा बनाया जाना — ओफ ! मैं स्वयं कैसे बच गया और कैसे उस शरणार्थी कैम्प तक आया , ये भी एक कष्टदायक कहानी है। और पिछली कहानियों का वर्णन करना मेरे बस में नहीं था। अब साहस तो है पर सामर्थ्य नहीं। क् योंकि जितने श ब् द दर्द को दिखाने के लिए मेरे पास हैं , दिल उन सबको निकम्मा घोषित कर चुका है।     पिछला मंगलवार अर्थात मेरे नवजीवन स...

अखबारवाला

कॉलिज के दिनों में एक बुरी लत गई, जो आज तक पीछा नही छोङ रही है। कई बार पत्नी से भी बहस हो जाती है, मेरे से ज्यादा प्यारा अखबार है, जिसके साथ जब देखो, चिपके रहतो हो। क्या किया जाए, अखबार पढने का नशा ही कुछ ऐसा है कि सुबह नही मिले तो लगता है कि दिन ही नही निकला। खैर पत्नि की अखबार वाली बात को गंभीरता से नही लेता हूं क्योंकि मेरे ऑफिस जाने के बाद खुद उसने पूरा अखबार चाटना है। पढी लिखी पत्नी चाहे, वो हाऊस वाईफ हो, एक फायदा तो होता है, कम से कम वह अखबार का महत्व समझती है। प्रेम भरी तकरार पति, पत्नी के प्यार को अधिक गाढा करती है। प्रेम भरी तकरार ही गृहस्थ के सूने पन को दूर करती है। तकरार ही आलौकिक प्रेम की जननी है। पहले ऑफिस घर के समीप था। सुबह अखबार तसल्ली से पढ कर ऑफिस जाता था, लेकिन नई नौकरी और ऑफिस घर से थोडा दूर हो गया तो घर से जल्दी निकलना पङता है। ढंग से अखबार ...

मौत

आँखों की धुँध सघन होती गयी, कुहरा बढ़ता गया और उसने सारे माहौल को लील लिया। अब मुझे कुछ भी नहीं दिख रहा था—कुछ भी नहीं। ताँगा शहर की तरफ बढ़ता आ रहा था और मैं हिचकोले खाता हुआ उस कुहरे में से निकलने का यत्न करने लगा। मैं अब कुछ-कुछ देखने में समर्थ हो रहा था। धुँध में से उभरते हुए कुछ चित्र दिखाई देने लगे थे। उन चित्रों में मुझे उस जिन्दगी के न€श दिख रहे थे, जो जिन्दगी काँच की गुड़िया-सी नांजुक थी—जो बच्चों की बातों-सी मासूम थी—सत्य थी—लेकिन इस जिन्दगी का दामन मेरे हाथों से छूट चुका था। अब मैं दुबारा उसे नहीं पकड़ सकता था। वर्षों पहले की बात— मैं तकली कातने में मग्न था। उस स्कूल में हमें बहुत-कुछ सिखाया जाता—कताई, बुनाई, खेती और दूसरे कई हुनर। मुझे कातने का बहुत शौक था। तब तीसरी क्लास में पढ़ता था मैं। अचानक मास्टरजी को मैंने अपने पास खड़े देखा। एक नए लड़के ने उनकी उँगली पकड़ रखी थी। ''यह सलीम है।'' मास्टरजी ने कहा। ''अब यह तुम्...

अधखिला फूल

पहली पंखड़ी वैशाख का महीना, दो घड़ी रात बीत गयी है। चमकीले तारें चारों ओर आकाश में फैले हुए हैं, दूज का बाल सा पतला चाँद, पश्चिम ओर डूब रहा है, अंधियाला बढ़ता जाता है, ज्यों-ज्यों अंधियाला बढ़ता है, तारों की चमक बढ़ती जान पड़ती है। उनमें जोत सी फूट रही है, वे कुछ हिलते भी हैं, उनमें चुपचाप कोई-कोई कभी टूट पड़ते हैं, जिससे सुनसान आकाश में रह-रह कर फुलझड़ी सी छूट जाती है। रात का सन्नाटा बढ़ रहा है, ऊमस बड़ी है, पवन डोलती तक नहीं, लोग घबड़ा रहे हैं, कोई बाहर खेतों में घूमता है, कोई घर की खुली छतों पर ठण्डा हो रहा है। ऊमस से घबड़ा कर कभी-कभी कोई टिटिहरी कहीं बोल उठती है। भीतों से घिरे हुए एक छोटे से घर में एक छोटा सा आँगन है, हम वहीं चलकर देखना चाहते हैं, इस घड़ी वहाँ क्या होता है। एक मिट्टी का छोटा सा दीया जल रहा है, उसके धुंधले उजाले में देखने से जान पड़ता है, इस आँगन में दो...